#25पैसे
मेरा पहला ब्लॉग... दोस्ती के नाम
मैं पीले रंग की उस स्कूल बस से दनदनाता हुआ उतर गया... उस दिन अपने दोस्त के साथ बैठा भी नहीं था बगल वाली सीट पर... अलग बैठा था, गुस्से में था। तीसरी-चौथी क्लास में पढ़ने वाला मैं और मेरा भयंकर गुस्सा। उसने पीछे से कई बार आवाज दी- देवाशीष... आज हम 25 पैसे लाए हैं, इंटरवल में चीज खाएंगे। बस के अंदर भी उसने मुझसे यह बात कही थी और बस से उतरने के बाद भी मेरे पीछे आते हुए उसने कई बार यही बात दोहराई- आज 25 पैसे लाए हैं... इंटरवल में चीज खाएंगे... मैं उतना ही नाराज़, ऐंठा हुआ आगे-आगे चला जा रहा हूं... उसकी बातों को सुनकर भी अनसुना करता हुआ...
ये वो दिन थे जब 25 पैसे में बहुत कुछ आ जाता था और चीज का मतलब चूरन, सौंफ, आइसक्रीम होता था, चीज़ सैंडविंच वाला चीज़ नहीं। उन सौंफ के पैकेट्स में फिल्म के नेगेटिव्स निकलते थे, जिन्हें हम लोग कलेक्ट करते थे। अब सौंफ और चूरन के वो पैकेट नहीं दिखते। फिल्में भी अब डिजिटल हो गई हैं, नेटफ्लिक्स पर आती हैं... नेगेटिव्स का जमाना गया। पर उन नेगेटिव्स में बहुत कुछ पॉजिटिव था, दोस्ती थी, मस्ती थी... ज़िंदगी थी।
#25पैसे... की पुकार लगाने वाला वो दोस्त है अमित चौधरी, अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में। जापान में काफी वक्त बिताया है उसने। हम दशकों से नहीं मिले हैं, लेकिन लगता है कल ही की तो बात है। ये सारा सीन मेरी आंखों के सामने से गुजर रहा है।
#नाराज़गी की वजह- पक्की तौर पर याद नहीं, लेकिन हमारी तिकड़ी थी, ट्रायो- मैं, अमित और राकेश। मेरी नाराज़गी की वजह शायद यह थी कि अमित और राकेश में ज्यादा छन रही थी, मैं ईर्ष्या में जल रहा था...
-ऐसे ही तजुर्बे साझा करता रहूंगा... बादल के गांव से
Gazab Sir..... Shabdo m apne pan ki feeling ...
ReplyDeleteKaun ho bhai, apna naam to bata do
Deleteक्या बात है...वो दिन लौटा दे
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